कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत

 प्रस्तावना :-

कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत पाश्चात्य काव्यशास्त्र का महत्वपूर्ण सिद्धांत है| कॉलरिज रोमांटिक युग के महत्वपूर्ण कवि तथा आलोचक थे| उनका जन्म 1972 ईस्वी में हुआ| उनकी शिक्षा दीक्षा क्राइस्टस तथा चिकित्सालय में हुई|साहित्य समीक्षा को दर्शन और मनोविज्ञान से जोड़कर कोलरिज ने नई समीक्षा प्रणाली विकसित की। उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति "बायोग्राफिक लिटरेरिया" 1817 में प्रकाशित हुई जिनमें काव्य सृजन-प्रक्रिया तथा कवि-प्रतिभा की गहन व्याख्या और कल्पना सिध्दांत का प्रतिपादन किया गया। उनका कल्पना-सिध्दांत पश्चिमी काव्यशास्त्र में आज भी मील का पत्थर है।'सेंट्सबरी' ने आलोचक के क्षेत्र में अरस्तू, लोंगिनुस के बाद तीसरा स्थान मानते है। विलियम वर्ड्सवर्थ कॉलरिज के मित्र थे।अत: दोनों ने मिलकर "लिरिकल बैलेड्स" में अपनी कविताओं का प्रकाशन किया। कोलरिज अभिजात वर्ग की भाषा बनाने के पक्षधर थे जबकि वर्ड्सवथ ग्राम जीवन (अशिक्षित जनता) के तथा दोनों में मतभेद हो गया। कोलरिज कविता की परिभाषा देते है-"कविता सर्वोत्तम शब्दों का सर्वोत्तम क्रम विधान है। ('poetry is the best words in the best order') और गद्य शब्दों का सर्वोत्तम क्रम-विधान है।(prose is words in their best order') अत: वे गद्य कविता में अन्तर मानते है। कविता का मूल प्रयोजन आनंद हैं

कल्पना किसे कहते हैं :-

वस्तु का प्रत्यक्षीकरण मानव  मस्तिष्क मैं प्रतिमा प्रतिमाओं को स्थापित करता है। वही प्रतिमाओं में परिवर्तन करके नवीनता उत्पन्न करता हैइसी नवीनता का नाम है कल्पना। कल्पना जीवन को महत्व देने का श्रेष्ठ माध्यम है। इसे दो प्रकारों में बांटा जाता है- प्रथम प्रकार की कल्पना के अंतर्गत दिवास्वप्न और मानसिक उड़ने आती है दिवस सपना और मानतिक उड़ानें आती हैं जिसकी सहायता के व्यक्ति एवं कल्पना जगत का निर्माण करता है जो वास्तविक जगत की तुलना में उसकी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कल्पना एक विशिष्ट मानवीय क्षमता है  यह हमें उन चीजों के विचारों का पता लगाने की अनुमति देती है जो हमारे वर्तमान परिवेश में नहीं है या शायद वास्तविक भी नहीं है हम बाहरी दुनिया से जानकारी लेते हैं और  अवधारणा  प्रक्रियाओं का उपयोग करके उसमें अर्थ ढूंढते हैं

कल्पना की विविध धाराएं :-

कॉलरिज से पहले कल्पना के बारे में कई तरह की संगत-असंगत धारणाएँ प्रचलित थीं। एक धारणा तो यह थी कि कल्पना एक दिव्य या रहस्यमय शक्ति है, जिसकी तर्कसंगत व्याख्या सम्भव नहीं है। यह अव्याख्येय है। ड्राइडन के अनुसार, ”उचित प्रतिभा प्रकृति का वरदान है।… इसमें परिष्कार कैसे किया जाए, यह अनेक ग्रन्थ बतला सकते हैं, किन्तु इसे प्राप्‍त कैसे करें, यह बताने वाला कोई ग्रन्थ नहीं है।’’ वर्ड्सवर्थ ने ‘एक खास तरह की दिव्य दृष्टि’ के रूप में इसका बार-बार उल्लेख किया है। यह दृष्टि हमारे सामने या तो प्रकट होती है या फिर नहीं होती। इसलिए हमें उसको खोजने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हमें तो बस उसके प्रकट होने का इन्तजार करते रहना चाहिए; उस समय तक जब तक वह अचानक हमारे सामने उद्भासित न हो उठे। दूसरे, कवि-प्रतिभा का सम्बन्ध उन्माद से जोड़ा गया था। यह धारणा काफी पुरानी थी और इसे कई प्रतिष्ठित दार्शनिकों और रचनाकारों का समर्थन प्राप्‍त था। प्लेटो ने कहा ही था कि कवि जिस समय रचना करता है, वह एक प्रकार की आविष्ट या असामान्य मनोदशा में होता है। शेक्सपियर ने ‘पागल, प्रेमी और कवि’ को एक स्तर पर रखा है, क्योंकि इन तीनों में कल्पना का अतिरेक होता है। ड्राइडन ने यह मान्यता व्यक्त की है कि ‘महान प्रतिभा का पागलपन से निश्‍चय ही नजदीकी रिश्ता होता है।’ स्वयं स्वच्छन्दतावादी युग में असामान्य वेशभूषा, मद में झूमते हुए चलने और विशेष रूप से तुनकमिजाजी को कवि या प्रतिभासम्पन्‍न व्यक्ति का लक्षण माना जा रहा था और कई कवि अपने-आपको प्रतिभावान सिद्ध करने के लिए इस तरह का आचरण करते दिखाई देते थे। तीसरी धारणा हॉब्स, लॉक, ह्यूम, हार्टले आदि अनुभववादी-साहचर्यवादी दार्शनिकों के माध्यम से सामने आई थी; जिनके अनुसार कल्पना एक बिम्बविधायिनी शक्ति है। इसका मुख्य काम है इन्द्रिय-संवेदन को मनश्‍च‍ित्रों में रूपान्तरित करना। इस धारणा के अन्तर्गत कल्पना, स्मृति की तरह, एक यान्त्रिक शक्ति भर बनकर रह गई थी, जिसमें सृजन या नवोन्मेष के लिए कोई स्थान नहीं था। चौथे, जर्मनी के भाववादी दर्शन में कल्पना के स्वरूप पर विचार किया गया था, विशेष रूप से काण्ट में। काण्ट के अनुसार कल्पना एक मध्यवर्ती शक्ति है, जो इन्द्रियबोध को विचार में बदलती है। कल्पना के बिना न तो इन्द्रियबोध सम्भव है, न विचार।

कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत:-

कल्पना की परिभाषा देते हुए कॉलरिज कहते हैं :-
कल्पना वह शक्ति है जिसका प्रयोग कलाकार अपने सर्वोत्तम भावात्मक क्षणों में करता है
कल्पना-विषयक परिभाषा को प्रतिनिधि स्वच्छन्दतावादी परिभाषा माना जा सकता है। इसमें उन्होंने स्वच्छन्दतावादी दौर की रचनाशीलता की पूरी संश्‍ल‍िष्टता को समाहित करने की कोशिश की।
कल्पना की व्याख्या करते हुए कॉलरिज ने लिखा है कि –
 “स्पष्ट रुप से संसार में दो शक्तियाँ कार्य करती हैं, जो एक दूसरे के संबंध में क्रियाशील और निष्क्रिय होती हैं और कार्य बिना किसी मध्यस्थ शक्ति के संभव नहीं है जो एक साथ सक्रिय भी है और निष्क्रिय भी है” दर्शन में इस ‘मध्यस्थ’ शक्ति को कल्पना की संज्ञा दी गई है।   
 बायोग्राफिया लिटरेरिया के तेरहवें अध्याय के अन्त में उन्होंने कल्पना को इन शब्दों में परिभाषित किया– मेरे विचार से कल्पना या तो मुख्य होती है या फिर गौण । मुख्य कल्पना एक जीवन्त शक्ति है और मानव के सम्पूर्ण इन्द्रियज्ञान का प्रमुख साधन है। यह सीमित मन में असीम सत्ता की सृजन-शक्ति की आवृत्ति है। गौण कल्पना को मैं इसी मुख्य कल्पना की प्रतिध्वनि मानता हूँ। इसका अस्तित्व चेतन इच्छा शक्ति के साथ होता है, किन्तु फिर भी साधन के प्रकार की दृष्टि से यह मुख्य कल्पना के समरूप ही होती है। इसमें जो भेद है वह केवल मात्र और कार्य पद्धति का है। यह पुनःसृजन के उद्देश्य से, मुख्य कल्पना से, प्राप्‍त सम्पूर्ण सामग्री का, विलयन करती रहती है, उसे गलाती-पिघलाती रहती है; अथवा जहाँ यह प्रक्रिया सम्भव नहीं हो पाती वहाँ भी हर हाल में यह आदर्शीकरण और एकीकरण के लिए संघर्ष करती है। यह अनिवार्य रूप से जीवन्त होती है, जबकि सभी वस्तुएँ (वस्तु के रूप में) अनिवार्यतः स्थिर और जड़ होती हैं। इसके विपरीत ललित-कल्पना में स्थिरता और सुनिश्‍च‍ितता के अलावा ऐसे कोई साधन नहीं होते, जिनको लेकर वह व्यस्त रहे। वास्तव में ललित-कल्पना देश काल के बन्धन से मुक्त-स्मृति का ही एक प्रकार है। यह इच्छा-शक्ति की उस अनुभवमूलक क्रिया से मिश्रित और रूपान्तरित होती है, जिसे हम शब्द चयन से व्यक्त करते हैं, किन्तु सामान्य स्मृति के साथ ही यह अपनी सम्पूर्ण सामग्री, जो पहले से बनी-बनाई होती है, बराबर साहचर्य-नियम द्वारा ही ग्रहण करती है।


कॉलरिज ने कल्पना के दो भेद बताए हैं :-
1.मुख्य कल्पना
2.गौण कल्पना


1 मुख्य कल्पना :- मुख्य कल्पना हमारे इन्द्रियबोध का आधार है। मुख्य कल्पना के सहयोग के बिना हमें इन्द्रियों से जो कुछ प्राप्‍त होगा, वह एकदम अव्यवस्थित, खण्डित और गड्ड-मड्ड होगा। मुख्य कल्पना इन्द्रियसंवेदन को इन्द्रियबोध में बदलती है। उसकी यह क्रिया सृजनात्मक है। मन इच्छाशक्ति-सम्पन्‍न स्रष्टा है। मन की यह सृजनशीलता इन्द्रियसंवेदन को यान्त्रिक प्रक्रिया भर नहीं रहने देती। इन्द्रियबोध की प्रक्रिया को उन्होंने सृजनात्मक इसलिए कहा कि वे इसमें मन की सक्रिय भूमिका को रेखांकित करना चाहते हैं। यह प्रक्रिया न तो सीधा-सादा बाह्यीकरण है, न तटस्थ भाव से इन्द्रियसंवेदन का आभ्यन्तरीकरण। यह इन दोनों प्रक्रियाओं का अत्यन्त सूक्ष्म सन्तुलन है। कल्पना वह सामान्य आधार है, जहाँ से संवेदना और विवेक दोनों का उदय होता है। इन्द्रियसंवेदन के साथ मुख्य कल्पना का सन्‍न‍िकर्ष होने पर ही हमें दृश्य जगत का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्‍त होता है। इन्द्रियज्ञान का आधार होने की वजह से मुख्य कल्पना का सम्बन्ध सभी चिन्तनशील प्राणियों से है। चूँकि इसका सम्बन्ध मानव-मात्र से है, इसका आधार-फलक अत्यन्त व्यापक है, अतः इसे ‘मुख्य कल्पना’ कहना उचित ही है। यह ‘मन की सम्पूर्ण समन्वित गतिविधि’ की द्योतक है। यह विचार फ्रांसीसी क्रान्ति द्वारा प्रेरित लोकतान्त्रिक विचारों के मेल में भी है।
 
मुख्य कल्पना की दूसरी विशेषता है जीवन्तता। यह एक जीवन्त शक्ति है। ‘जीवन्त’ से कॉलरिज का आशय है सक्रिय और जैविक, निष्क्रिय और यान्त्रिक नहीं। यान्त्रिक और जैविक रूपविधान में कॉलरिज ने अन्तर भी स्पष्ट किया, वह भी अविस्मरणीय शब्दावली में। इन्द्रियों से जो सामग्री प्राप्‍त होती है, उसमें मुख्य कल्पना जीवन्तता का संचार करती है और उसे जैविक अन्विति में ढालती है। सांसारिक ‘वस्तुएँ, वस्तु के रूप में, स्थिर और जड़’ हैं। वे अनिवार्य रूप से सीमित हैं, और उनमें अपने-आप में क्रियाशक्ति की योग्यता नहीं है। किन्तु जब किसी जाने-पहचाने भूदृश्य पर ‘चाँदनी की किरणें’ या ‘संध्या के धूपछाँही रंग’ पड़ते हैं, तो उसका कायाकल्प हो जाता है, उसी प्रकार स्मृति और ललित-कल्पना से हमें जो सामग्री प्राप्‍त होती है वह यान्त्रिक और निर्जीव होती है, किन्तु प्रकृति और मानव-आत्मा के परस्पर सम्बद्ध होने से, और कल्पना के रंगों से, उसमें नवजीवन का संचार हो जाता है। कल्पना ऐसी जादुई शक्ति है, जो हमें मिथ्यात्व का अहसास नहीं होने देती। इसके अतिरिक्त, मुख्य कल्पना ‘सीमित मन में असीम सत्ता की सर्जना-शक्ति की आवृत्ति है।’ दूसरे शब्दों में, इन्द्रियबोध के दौरान मन की जो सृजन-शक्ति है, वह सृजन के दौरान ईश्‍वरीय शक्ति की ही आवृत्ति है। यहाँ कॉलरिज कहना चाहते हैं कि मुख्य कल्पना मनुष्य में ईश्‍वर की प्रतिनिधि है। द फ्रेण्ड में उन्होंने लिखा – ‘विधाता ने आत्मरूप में ही मानव की सृष्टि की।’ कॉलरिज ईश्‍वर, मानव-मन और कल्पना को एक ही स्तर पर रखते हैं, अतः जो विशेषताएँ ईश्‍वर में हैं, वे मानव-मन और कल्पना में भी दिखाई देंगी। मानव-मन ईश्‍वर के मानस का सबसे सशक्त प्रतीक है। इसीलिए आत्मविश्‍लेषण मूल्यवान क्रिया है। अपने-आपको जानने का प्रतीकात्मक अर्थ है, ईश्‍वर को जानना। कल्पना उस ईश्‍वर को जानने की कुंजी है। बल्कि कल्पना को वे ईश्‍वर का अत्यन्त विराट प्रतिरूप मानते हैं। जैसे ईश्‍वर संसार में सर्वत्र व्याप्‍त रहता है, किन्तु कहीं दिखाई नहीं देता उसी प्रकार शेक्सपियर जैसे महान रचनाकार अपनी रचनाओं में सर्वत्र व्याप्‍त रहते हुए भी अलक्षित रहते हैं, अपने निजी व्यक्तित्व को कहीं आरोपित नहीं करते।
 गौण (या विधायक) कल्पना ‘मुख्य कल्पना की प्रतिध्वनि’ है; मुख्य कल्पना की सृजनशीलता की प्रतिध्वनि। इन्द्रियबोध के दौरान जो सृजन-शक्ति मुख्य कल्पना में कार्यरत रहती है, उसी की प्रतिध्वनि गौण कल्पना है। ‘प्रतिध्वनि’ शब्द से कॉलरिज संकेत करना चाहते हैं कि मुख्य कल्पना का पूर्व-अस्तित्व गौण कल्पना के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। इन दोनों में कॉलरिज कोई गुणात्मक अन्तर नहीं मानते। कलात्मक सृजन हमारे दैनन्दिन इन्द्रियबोध जैसा ही है। उनमें जो अन्तर है वह ‘केवल मात्रा और कार्य-पद्धति’ का है, प्रकारगत या गुणात्मक नहीं। विधायक कल्पना के लिए संवेदनशीलता अधिक चाहिए, आवयविक इकाई में ढालने की योग्यता अधिक चाहिए। दोनों की कार्य-पद्धति में अन्तर यह है कि मुख्य कल्पना जहाँ केवल निर्माण करती है, वहाँ गौण कल्पना नाश और निर्माण दोनों। यह अन्तर आगे के विवेचन से और स्पष्ट होगा।

प्रथम कल्पना गौण तथा कल्पना में अंतर:-

मुख्य कल्पना के अस्तित्व पर ही गौण कल्पना आश्रित है।
     1. मुख्य कल्पना अचेतन एवं अनैच्छिक है जबकि गौण कल्पना चेतन एवं ऐच्छिक है।
      2. मुख्य कल्पना केवल निर्माण या संगठन करती है जबकि गौण कल्पना विनाश एवं निर्माण दोनों करती है।
      3. मुख्य कल्पना का संबंध भौतिक जगत से है जबकि गौण कल्पना का संबंध भौतिक जगत के साथ-साथ अध्यात्मिक जगत से भी है।
      4. मुख्य कल्पना जनसामान्य के मष्तिष्क में भी होती है, जबकि गौण काल्पन दार्शनिक और कलाकार का विषय है।
    5. कॉलरिज ने गौण कल्पना को श्रेष्ठ माना है, जबकि वर्ड्सवर्थ मुख्य कल्पना को श्रेष्ठ मानते हैं।
      6. कॉलरिज कल्पना को आत्मा की शक्ति मानते हैं कल्पना का कार्य महत्वपूर्ण है।

फैंसी क्या है :-

फैंसी को हिंदी में रम्य कल्पना ललित कल्पना तथा बिम्ब निर्मात्री अलग-अलग नाम से जानते हैं फैंसी फैंसी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘फैंटेसिया’ (Phantasia) से मानी जाती है जिसका संबंध कल्पना से है वस्तुतः कॉलरिज ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने फैंसी के स्वरूप एवं आयाम पर गंभीरता से विचार किया हैऔर उसे कल्पना से सर्वथा अलग किया कॉलरिज ने बायोग्राफीय लिटरेरिया में लिखा है की फांसी या ललित कल्पना (रम्य कल्पना) देश व काल के बंधन से मुक्त स्मृति का ही रूप है और यह योजक के रूप में कार्य करती है
फैंसी ललित कल्पना स्मृति का एक प्रकार है यह स्मृति देश और काल के बंधन से मुक्त करती है सामान्य स्मृति देश व काल के बंधन में रहती है उदाहरण के लिए :-


जैसे बिहारी का दोहा -
'चममचात चंचल नयन बिच घूघंट पट झीन।
'मानहु सुरसरिता विमल जल उछरत जुग मीन।।


बिहारी ने निर्मल जल में कभी मछलियों को उछलते देखा होगा। जो स्मृति में संचित कविता रचते समय वह दृश्य उनके मानस-पटल पर एकाएक उभर आया होगा प्रस्तुत दोहे में घूघंट पट के भीतर ,नायिका की चमचमाती चंचल आंखों की शोभा को मूर्त रूप देने के लिए ,जब वह उसे बिंब के रूप में प्रयुक्त करता है। तो वह समय वह स्मृति देश-काल के बंधन से मुक्त हो जाती है।
रम्य कल्पना को कोलरिज स्मृति का ही प्रतिरूप मानता है। लेकिन सामान्य स्मृति और रम्यकल्पना में कुछ भेद है, जहाँ स्मृति देश-काल के बंधन में रहती है,वही रम्यकल्पना देश-काल से मुक्त तथा इच्छाशक्ति के द्वारा संचालित एवं रूपांतरित होती है। और उसकी उपयोज्य सामग्री स्थिर तथा सुनिश्चित होती है
 

कल्पना और फैंसी में अंतर :-

कॉलरिज से पहले ललित-कल्पना (फैंसी) और कल्पना (इमेजिनेशन) में कोई अन्तर नहीं था। वे या तो परस्पर पर्याय थे या फिर एक ही शक्ति के उच्‍च और निम्‍न स्तर। कॉलरिज ने इनमें गुणात्मक अन्तर माना। दोनों मानसिक शक्तियाँ हैं और सृजनशीलता में दोनों की भूमिका रहती है। मन की जो शक्ति बिम्ब-निर्माण में सक्रिय रहती है, और जो निष्क्रिय तथा यान्त्रिक है, उसे उन्होंने ललित-कल्पना कहा और मानव-मन के सृजनात्मक पक्ष को कल्पना नाम दिया। कल्पना और ललित-कल्पना जिस सामग्री को आधार रूप में ग्रहण करती हैं, उसकी प्रकृति एक-जैसी (स्थिर और जड़) होती है। किन्तु जहाँ कल्पना जिन पदार्थों का स्पर्श करती है उनमें जीवन्तता का संचार कर देती है; वहाँ ललित-कल्पना उनका यान्त्रिक रूप में संयोजन भर करती है। कॉलरिज के अनुसार, ललित-कल्पना स्मृति का ही एक रूप है–‘ललित-कल्पना देश काल के बन्धन से मुक्त स्मृति का ही एक प्रकार है।’ ललित-कल्पना और स्मृति दोनों मानसिक शक्तियाँ हैं। ललित-कल्पना में निष्क्रियता की प्रधानता है और स्मृति में यान्त्रिकता की। ललित-कल्पना ऐसी स्मृति है, जो देशकाल के बन्धन से मुक्त हो। ललित-कल्पना और कल्पना दोनों मानसिक शक्तियां हैं। एक का काम है यांत्रिक, दूसरी का सर्जनात्मक। कल्पना और ललित-कल्पना दोनों को आधार-सामग्री स्मृति से मिलती है, किन्तु दोनों के परिणाम में अन्तर है–कल्पना जहाँ उस सामग्री का कायाकल्प कर देती है, उसमें गुणात्मक अन्तर ला देती है, वहाँ ललित-कल्पना उनका संयोजन भर करती है। कॉलरिज के शब्दों में, ‘यह अपनी सम्पूर्ण सामग्री, जो पहले से बनी-बनाई होती है, बराबर साहचर्य नियम द्वारा ग्रहण करती है।’ कहने की आवश्यकता नहीं कि ललित-कल्पना का स्वरूप-निर्देश करते समय कॉलरिज के दिमाग में नव्यशास्‍त्रवादी काव्य है, जबकि कल्पना का विवेचन करते समय उनके मन में समसामयिक स्वच्छन्दतावादी काव्य का बिम्ब रहता हैं अत: कल्पना और रम्यकल्पना   का अंतर केवल मात्रात्मक होती है जबकि कल्पना और रम्यकल्पना का अंतर मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों होती है। अत: रम्यकल्पना बिंबों को केवल पास-पास रख देती है, उनमें कोई परिवर्तन नहीं करती, किन्तु कल्पना उन्हें विघटित, विगलित कर बिलकुल नये रूप में ढाल देती है।  कल्पना बिंबों में आंतरिक सामंजस्य और एकरूपता लाती है।जबकि रम्यकल्पना केवल निश्चित वस्तुओं में एकत्र का कार्य करती है। कल्पना प्रत्यक्ष रूप में ग्रहण करती है जबकि रम्यकल्पना स्मृति रूप में ग्रहण करती है। अत: कल्पना का सम्बन्ध आत्मा और मन से है। और ललित कल्पना का मस्तिष्क से। कल्पना का कार्यपध्दित जैव हैं किंतु रम्यकल्पना का यांत्रिक है।कल्पना प्रतिभा  की उपज है; रम्यकल्पना प्रज्ञा  की।

निष्कर्ष :-

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि काॅलरिज की कल्पना सम्बन्धी मान्यता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि कल्पना के द्वारा ही सर्जक कलाकार प्रतिबोधन और अवबोधन के बीच की खाई को पाटने में सफल हो पाता है। बुद्धि अनुशासित कर सकती है, नियंत्रित कर सकती है, किन्तु कल्पना वह जीवन्त शक्ति है, जिसके सहारे रिक्तता को पूर्णत में बदला जा सकता है। कल्पना की इसी क्षमता और इसी विशिष्टता को काॅलरिज ने बार-बार रेखांकित किया है।

संदर्भ ग्रंथ:-

1.पाश्चात्य काव्यशास्त्र---देवेन्द्रनाथ शर्मा। प्रकाशक--मयूर पेपरबैक्स, 

2. भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र---डाँ. सत्यदेव चौधरी, डाँ. शन्तिस्वरूप गुप्त। अशोक प्रकाशन

3. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की पहचान---प्रो. हरिमोहन । वाणी प्रकाशन

4. पाश्चात्य काव्यशास्त्र की  परंपरा :-  डॉ नागेंद्र



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