संरचनावाद
प्रस्तावना:-
60 के दशक में फ्रांस में फर्डिनेंड डी ससूर की भाषिक अवधारणा को आधार बनाया गया। यह कोई वैज्ञानिक आंदोलन नहीं, एक 'प्रशास्त्र' है। फ्रेंच नृतत्वी या मानवविज्ञानी क्लॉड लेवी स्ट्रास ने प्रथम रक्तसंबंध के माध्यम से संरचना को समझने का प्रयास किया। वे संरचना को 'संबंधों का समुच्चय' मानते हैं। ससूर का संकेत प्रणाली इसका आधार थी। ससूर की मान्यता थी कि चित्रकारी, संकेतित तथा वास्तव में एक निर्माता संबंध होता है, जो रुढ़ी पर आधारित है। संरचनावाद का संघर्ष 'वाक' व 'वाच्य' तथा 'ऐतिहासिक' व 'एककालिक' को लेकर भी बना रहता है। इस पद्धति में ऐतिहासिक व्याख्या की जगह एक्कालिक विश्लेषण जोर दिया गया है। वाच्य या पैरोल पर एक प्रमुख नियम है, वाच्य या पैरोल पर नियंत्रण अनिवार्य रूप से होता है, वाच्य या पैरोल का संकल्पना पैरोल में ही मूर्ति होती है। मूलतः पैरोल का विश्लेषण महत्वपूर्ण माना गया।
संरचनावाद क्या है :-
संरचनावाद पाश्चात्य समीक्षक जगत से हिंदी में आया। इसका विकास फ्रांस में 1960 के दशक में हुआ।
यह जीव विज्ञान, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र, साहित्य आदि की एक व्यापक आलोचना पद्धति है। संरचनावाद वस्तु के घटक, उनके अव्यय और उनके आविष्कार का विवेचन करता है।
- स्विस भाषाविद् फर्डिनेंड डी ससूर (फर्डिनेंड डी ससूर) की संरचनावाद की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। प्यारे ने भाषा के दो रूप माने-
- लांग (भाषा)-अंतवैयिक भाषा।
प्रतीकों की ऐसी व्यवस्था जो संपूर्ण समाज में विचक्षण संप्रदाय की अभिव्यक्तियाँ हैं।
- परोल (Parol)-व्यक्ति विशेष की भाषा।
सीमित क्षेत्र की भाषा। व्यक्तिगत भेद से इसके स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। संरचनावाद का प्रयोग सांस्कृतिक संदर्भों, जैसे-मिथकों, वैज्ञानिक कृतियों को समझने के लिए लेवी स्ट्रास ने किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक संस्कृति का एक अहम हिस्सा माना जाता है। बार्थ ने 'फैशन सिस्टम' नाम की किताब लिखी है। उनका अर्थ केवल पाठ में नहीं बल्कि पाठ की संरचना में निहित माना जाता है
संरचनावाद का इतिहास :-
20वीं सदी के गणतंत्र में संरचनावाद को शिक्षा में शामिल किया गया और भाषा, संस्कृति और समाज के विश्लेषण से संबंधित शिक्षा क्षेत्र में यह सबसे अधिक प्रचलित संप्रदाय में से एक बन गया। फर्डिनेंड डी सॉसर की भाषा शास्त्र से संबंधित कार्य को औपचारिक रूप से संरचनावाद का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है। फ्रांसीसी मानवविज्ञानी क्लॉड लेवी-स्ट्रॉस के कार्य में स्वयं "संरचनावाद" शब्द प्रकट हुआ और फ्रांस में "संरचनावादी आंदोलन" को बढ़ावा दिया गया, जिसने लुई अल्थूजर, मनोविश्लेषक जैक्स जैसे विचारकों को ही नहीं बल्कि संरचनात्मकवादी मार्क्स निकोस पोलेंटस के कार्य को भी प्रेरित किया। इस आंदोलन के अधिकांश सदस्यों ने अपने किसी भी आंदोलन का एक भाग के रूप में उल्लेख नहीं किया है। संरचनावाद सांकेतिकता से बहुत गहराई से यात्रा हुई है। उत्तर-संरचनावाद ने स्वयं को बनाने की विधि के सरल प्रयोग से अलग करने का प्रयास किया। डिकनशाट्रक्शन डेमोक्रेट विचारधारा से खुद को अलग करने की कोशिश थी। उदाहरण के लिए, जूलिया क्रिस्टेवा जैसे कुछ बुद्धिजीवियों ने बाद में उत्तर-संरचनावादी बनने के लिए संरचनावाद (और रूसी रीतिवाद) को एक प्रारंभिक बिंदु के रूप में लिया। सामाजिक विज्ञान में संरचनावाद के प्रभाव के कई साधन हैं: जो समाजशास्त्र के क्षेत्र में काफी प्रचलित है।
संरचनावाद के मूल तत्व:-
'संरचना में मूल दृष्टिकोण यह है कि कृति में यही देखा जाए कि वस्तु, भाव और विचारपक्ष किस प्रकार की संरचना है अर्थात् शब्द, लय, अलंकृति या कथन की भंगिमा में एक संयुक्त रूप हो गया है और दोनों पक्ष संयुक्त उस रचना को क्या आभाष, क्या कांति और क्या सौंदर्य प्रदान करते हैं।
1. संरचनावाद का मूल आधार है- भाषिक दृष्टि से साहित्य का सारांश।
2. संरचनावाद भाषा का संबंध से है। जॉन लॉक की व्याख्या उस भाषा का स्वरूप बड़ा जटिल है। शब्द का सामान्य अर्थ में भी प्रयोग किया जा सकता है और विशिष्ट अर्थ में भी।
ससूर भाषा के दो प्रेमियों का उल्लेख है-
(i) परोल (पैरोल) अर्थात् भाषा का मनोवैज्ञानिक पक्ष
(ii) लैंग्वेज (भाषा) जो भाषा का मनोवैज्ञानिक पक्ष है।
'लेंगुई' और 'परोल' (अर्थात भाषा और वाक्) की प्रक्रियात्मक संरचना और संरचनावाद की जड़ है। संरचना का परिवर्तन शब्दार्थ के परिवर्तन का अर्थ है। उदाहरण के लिए कबीर और बिहारी के दो दोहे प्रस्तुत हैं:
फूली-फूली साईं लाई काल हमारी बार।। (कबीर)
अली काली ही सों विन्ध्यौ, आगे कौन हवाल॥ (बिहारी)
उक्ति दोनों दोहों में 'कली' शब्द का अर्थ अलग-अलग होता है। कबीर ने काली (क्लियान) का प्रयोग 'नश्वर जीव' की नश्वरता को करने के लिए किया है, तो बिहारी ने 'काली' का 'अल्पायु में विद्या किशोरी' के लिए प्रयोग किया है। इसका मूल अर्थ भेद भेद का कारण है।
5. ससूर भाषा में एक ऐसी व्यवस्था मानी गई है जिसका निर्माण चिन्ह सिंबल से हुआ है।
एक चिन्ह के दो तत्व होते हैं -
पहला तत्त्व 'व्यंजक' है और दूसरा तत्त्व 'व्यंजक' है। 'हाथी' के नायकों से हमारे मन में तुरंत हाथी का बिंब उभरता है।
ये चिन्ह हमें हजारों साल की भाषा की परंपरा से प्राप्त हैं। ससुर का विचार है कि ये चिन्ह मनमाने से अलग-अलग समुदाय में अलग-अलग चिन्ह बनाये जाते हैं। विज्ञान और संरचनावाद को ससूर का यह अप्रतिम योगदान है। शब्दगत संरचना नाना प्रकार के अनुभव जगत को रूपायित करती है, जिसे 'संरचना' का अध्ययन करके समझा जा सकता है।
शब्द, पद, वाक्य, मुहावरा और संस्कृति। सही संरचना संरचना ही संरचनावाद है।
8. समग्र रूप से कह सकते हैं किवाद संरचना लेखक अनुभव और समीक्षक ज्ञान से युक्त पाठ निर्माण और पाठ संरचना दोस्तों को जोड़ने पर अधिक बल देता है।
संरचनावाद का मूल सिद्धांत:-
(i) माली आवत देख काल कारि कॉल।
ii) नहिं परा नहिं मधुर नहीं, नहिं विकास इहि काल।
3. संरचना में पूरी तरह से मौजूद है, यथा वह शास्त्रीय कृति की हो या मिथक की हो। 'रूपवाद' या 'रूसी रूपवाद' की स्थापना के लिए कम्युनिस्ट स्ट्रक्चर और वास्तुशिल्प उत्तरवाद को समझना आवश्यक है। रूपवाद साहित्यलोचन का 'रूपनिरपेक्ष' अर्थ 'काव्यभाषाशून्य' समीक्षक है। डॉ. नामवर सिंह की समीक्षाकृति 'कविता के नए प्रतिमान' पर 'रूसी रूपवाद' का स्पष्ट प्रभाव है।
4. रूपवादियों ने कृति को प्रथम स्थान दिया। वे कृति के बाहर सुन्दर और सन्देश देने वाले नहीं हैं।
1. स्वर बिम्ब
2. विचार
6. प्राग स्कूल के प्रमुख मुकारोव्स्की ने साहित्य की समीक्षा पद्धति से भिन्न एक नई समीक्षा पद्धति को बल दिया, जो 'संरचना' और प्रकार पर बल देती है। वे कविता को भाषागत संरचना प्रदान करते हैं। उनकी दृष्टि में संरचना भाषा निर्माण के आरंभ की व्यवस्था है।
7. आधुनिक संरचना समूह में नृत्य विज्ञान क्लैड स्ट्रास और रोलां बार्थ प्रमुख हैं। इनमें से अतिरिक्त फ़ूको, अल्युसर लैकोन आदि ने संरचनावाद पर गहराई से विचार किया। रोलाम्बार्थ ने 'संस्कृति' को भी भाषा माना और संस्कृति-धार्मिक साहित्य की व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। आधुनिक संस्कृति की संरचना भी भाषा की तरह है। संरचनावाद ने अपनी कृति का नाम डी फैशन अपने सिस्टम में लिखा है, "अर्थ लेखक के पास पाठ की संरचना में निहित होता है।" साहित्य निर्माण में पांच तत्व काम करते हैं:
संरचना सिद्धांत के आधार भूत तत्व:-
(1)अखंडता -अखंडता का संबंध आंतरिक संगति से है। किसी भी कृति के विभिन्न संघ कार्य में एक विशेष अवति होती है। कृति के संघटक घटक जैसे- शब्द, पद, पदबंध, वाक्य संरचना, वाक्य रचना में परिवर्तन करने से अर्थ परिवर्तन हो जाता है। उदाहरण के लिए- रंगीन पोशाक और रंगीन मिज़ा शब्द में रंगीन का अर्थ अलग-अलग है।
(2) संरचना - संरचना आपकी अर्थवत्ता से जुड़ी हुई है। कवि विशेष प्रस्ताव से 'शब्द' का प्रयोग अलग-अलग प्रकार से होता है। .. अर्थात शब्द का अर्थ उसका प्रस्ताव असंतुलित है। उदाहरण -
(3) स्वाधीनता : अपनी सत्यता की संरचना किसी अन्य पर आधारित नहीं होती। संघ की संरचना से ही उसका अर्थ व्यक्तित्व होता है।
संरचनावादी मूल्यांकन प्रविधि :-
संरचना और संरचनावाद भाषिक दृष्टि से साहित्य के मूल्यांकन के प्रतिमान हैं। आधुनिक आलोचना में शैली वैज्ञानिक आलोचना भी संरचना पर विशेष बल देती है।
संरचना एक सावयव या संगतिनिष्ठ साकल्य के रूप में होती है। 'संरचना' विभिन्न भाषिक तत्वों जैसे कि ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य और अर्थ के बीच अन्वय संबंधों पर निर्भर करती है।
संरचना की इसी प्रकृति के कारण संरचना स्वयं में प्रेक्षणीय (दृष्टिगोचर) नहीं होती, किन्तु उसका परिज्ञान प्रेक्षण क्रिया द्वारा ही किया जाता है, जो दो प्रकार की होती है:
(1) भाववादी :- भाववादी समीक्षक (प्रेक्षक) किसी कृति की अभ्यंतर प्रकृति को स्वयं समझना चाहता है और उसकी व्याख्या स्वयं की गई आत्मगत व्याख्या होती है अर्थात् वह कृति में अंतर्निहित भाव की व्याख्या करता है।
(2) वस्तुवादी :- वस्तुवादी समीक्षक संरचना का केंद्र व्यक्ति को न मानकर वस्तु (कृति) को मानता है।
इस प्रकार संरचना प्रछन्न रूप से कृति की आंगिकता में निहित रहती है ।
Comments
Post a Comment